पता नहीं क्यों किसी साज़िश का आभास हो रहा था, और वो आभास इतनी जल्दी सच्चाई में परिवर्तित होने को तत्पर हो जाएगा इसका मुझे भान न था.
देश की निरंतर बढती आबादी और उसके फायदे और नुक्सान पे काफी बहस हो चुकी है, लोगों ने दोनों पक्षों को गहराई से समझ भी लिया है. इसके तार कई और मामलों से जुड़े होने के कारण आबादी पे बहस अक्सर ही छिड़ जाती है. काफी सहज है समझना की आबादी और हमारी मूलभूत आवश्यकताएं (रोटी कपडा और मकान) और बहुतेरी उच्च आवश्यकताएं या जरूरतें (पानी बिजली सड़क और अन्य इन्फ्रास्ट्रक्चर सुविधाएँ जिसमे आजकल मोबाइल भी जुड़ गया है ), देश में आयात और निर्यात पर असर डालती हैं और आयात/निर्यात लगा रहता है, न ही केवल वस्तु का अपितु ज्ञान का, तकनीक का ... जो की आवश्यक है, इसी दौरान लोगों को व्यापर करने के मौके मिलते हैं, धनवान/व्यापारी/निवेशक मौके तलाशते हैं और जब सीमायें खुली हों तो आकांक्षाएं ज्यादा ऊपर ले जाने के दंभ में तलाश दोनों दिशाओं में करती हैं. ये नए विचार निर्मित करती है नयी गति और दिशा प्रदान करती है. प्रयास की गति और विचार सही दिशा में हो इसका सञ्चालन हेतु देश की सरकार और प्रशाशन जिम्मेदार होती है.
विश्वस्तर पे, दुसरे राष्ट्र में हो रहे बदलाव का असर किसी अन्य राष्ट्र पे होना स्वाभाविक है. सभी सरकारी और प्रशाशनिक निर्णयों का राष्ट्र पे दूरगामी सकारात्मक प्रभाव हो, सरकार और प्रशाशन का सर्वोच्च कर्त्तव्य होता है.
अमेरिका में मंदी के बादल छंटे नहीं हैं, वहां की सरकार प्रयासरत है और होना भी चाहिए. लेकिन किसी और की जरूरत हमारे गले की फाँस न बने इसका ख्याल तो हमें ही रखना होगा.
व्यावसायीकरण ने अमेरिका को कई दशकों तक सर्वोच्च रखा, वो ही अब जटिल अवस्था में पहुँच गया है. जहाँ तक मुझे लगता है अमेरिका की नज़र अभी भारत के बाज़ार की तरफ हैं, जिसमे ज्यादा कोई हर्ज़ नहीं है. ये बाज़ार में उदारीकरण का दायरा अगर उच्च आवश्यक सामग्री के आयत निर्यात तक ही सीमित हो तो ज्यादा अच्छा है.
संगठित खुदरा व्यवसाय में विदेशी निवेश का दूरगामी परिणाम ठीक जान नहीं पड़ता. अमेरिका के एक डाकुमेंट्री (फ़ूड इंक) ने इन खुदरा श्रंखलाओं के नकारात्मक प्रभावों को बड़े ढंग से प्रकाशित किया है. इसमें दिखाया गया है की किस तरह अब वे अमेरिका के सारे कृषि/भोजन तंत्र को संचालित कर रहे हैं. किस तरह कोई भी निर्णय वहां की सर्कार द्वारा उनके पक्ष में लेने को ही विवश होना पड़ता है. एक बार इस तरह के संजाल का निर्माण होने भर की देर है फिर तो सारा नियंत्रण उनको ही हस्तांतरित हो जाता है. वे छोटे कृषक को मजबूर कर देते हैं की वो अपने आप को समर्पित कर दें और उनकी अपनी अस्तित्वता खतरे में आ जाती है, छोटे और मजबूर कृषक इन बड़े संघटन के सामने बौने साबित होने लगते हैं और सारे निर्णय उनको इन संघटन के कहने पे ही लेना होता है. स्वयित्ता के आभाव में एक कृषक मजदूर के अलावा कुछ भी नहीं रहता.
सभी खाद्य संसाधन बड़े पैमाने पर उत्पादन के कारण उसके रख रखाव / प्रोसेसिंग में आमूलचूल परिवर्तन होते हैं. उत्पादन को और भी बढाने के लिए प्रयासरत संघटन और भी नए प्रोसेसिंग को अपनाते हैं और भोजन के प्राकृतिक स्वरुप को कृत्रिम बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ते, जिसके परिणामस्वरूप अनेक तरह की नयी बिमारियों का प्रादुर्भाव समाज को ग्रसने लगता है. बीज से लेकर भोज्य पदार्थ के सेवन तक सभी कुछ अप्राकृतिक हो चूका होता है, इन अप्राकृतिक अनियंत्रित पदार्थों के सेवन फलस्वरूप ये कृत्रिम भोजन आपके प्राकृतिक संरचना में सामंजस्य नहीं बिठा पातीं और आपकी प्रकृति पे अवान्क्षनीय असर समाहित कर देती हैं जो आपको ही नहीं आपके अनुवांशकिय गुणों के परवर्तन में सक्षम हैं.
हमारे खुदरा व्यवसायियों पे अल्पकालिक असर से भी ज्यादा ये दृश्य अधिक भयावह है.
एक छोटा सा उदहारण आज के परिप्रेक्ष्य में, यदि आप आज बाहर भोजन करने जाएँ एक वातानुकूलित रेस्टोरेंट में आपका बिल १००-५०० प्रति व्यक्ति आ सकता है, अगर आप भोजन करने मैकडॉनल्ड्स जाएँ आपका बिल ज्यादातर १०० प्रति व्यक्ति होगा. जो थोडा तथ्यों से परे है, परिचालन लागत तो कहीं से कम नहीं लगती, फिर ये पेट भर खाने में इतना अंतर कहाँ से आ गया, जबकि काफी वस्तुएं अमेरिका से आयात होती हैं. आप भी सोचिये और हो सके तो फ़ूड इंक नामक ये डोकउमेंट्री जरूर देख लीजिये. फिर आप एक गणतंत्र राष्ट्र के नागरिक के अधिकार स्वरुप अपने विचारों को व्यक्त करने के लिए स्वतंत्र हैं.
थोडा और वर्तमान परिप्रेक्ष्य में ये विपरीत प्रयासों को भी अपने संज्ञान में रखें
अमेरिका में : http://www.reuters.com/article/2011/11/26/us-obama-business-idUSTRE7AP0N220111126
भारत में : http://www.thehindu.com/todays-paper/article2657937.ece?=
जय हिंद,
ऋषि कान्त